Thursday, December 29, 2011

असमंजस !!

जीवन के इस पड़ाव पर हूँ
के नहीं पता मैं क्या करूँ।
रास्ता बतलायेगा कोई, रुकूं ?
या अपना रास्ता खुद ही चुनूं?

नदी जैसे डोल रही हूँ
कभी इधर कभी उधर
पर क्या मेरी कोई दिशा निर्धारित है?
मैं जा रही हूँ किधर?

नाते रिश्ते, धर्म कर्म से परे
चाह के भी न जा सकूँगी
जो सपने पलकों में सजा रखें हैं मैंने
क्या उन्हें कभी पा सकूँगी?

प्रश्न अनेक हैं पर उत्तर नहीं है एक
तप रही हूँ, इस धूप में खुद को रही हूँ सेंक
फिर भी अपनी मंज़िल को ढूँढ न पाऊँ
इस असमंजस से बहार कैसे आऊँ?

( यह किसी एक की नहीं, हर एक प्राणी की स्तिथि है। किसी न किसी बात पे कोई न कोई यूँ असमंजस में पड़ जाता है की अपने प्रश्नों का कोई हल ही नहीं ढूँढ पाता। )

Friday, May 27, 2011

मेरी पहली कविता |
















कुछ अजीब थी

मेरी पहली कविता


परीकथाओं में ही सिमटा था तब

मेरे लिए यह धरती का अस्तित्व

मनीषियों के प्रवचनों का ज्ञान तो दूर

अपने ही विचारों का ठिकाना न था


बालू के ढेर पर बैठ के मंदिर बना रही थी

माँ ने जोर से आवाज़ दी

और बोलीं

"अँधेरे का ख्याल नहीं है तुमको?

कल तुम्हारे नतीजे निकलेंगे दूसरी कक्षा के

अब नयी कक्षा में जाओगी तुम!

तय्यारी नहीं करनी?"

यह कह के माँ मुस्कुरा उठी

और चूम लिया मेरे ललाट को


मैंने भी सारे पुराने किताब समेट लिए

और लगी कल का इंतज़ार करने

हाथ के पास एक कॉपी पड़ी थी

और हाथ में एक लेखनी

बस, और क्या चाहिए?

जड़ दिए कॉपी के पन्ने पे

एक-एक कर चार लाइनों की पंक्ति


"रिजल्ट क्यूँ आता है?

रोज़ डांट खिलाता है॥

अगले साल फिर पढना है

अच्छा रिजल्ट करना है"