Friday, May 27, 2011

मेरी पहली कविता |
















कुछ अजीब थी

मेरी पहली कविता


परीकथाओं में ही सिमटा था तब

मेरे लिए यह धरती का अस्तित्व

मनीषियों के प्रवचनों का ज्ञान तो दूर

अपने ही विचारों का ठिकाना न था


बालू के ढेर पर बैठ के मंदिर बना रही थी

माँ ने जोर से आवाज़ दी

और बोलीं

"अँधेरे का ख्याल नहीं है तुमको?

कल तुम्हारे नतीजे निकलेंगे दूसरी कक्षा के

अब नयी कक्षा में जाओगी तुम!

तय्यारी नहीं करनी?"

यह कह के माँ मुस्कुरा उठी

और चूम लिया मेरे ललाट को


मैंने भी सारे पुराने किताब समेट लिए

और लगी कल का इंतज़ार करने

हाथ के पास एक कॉपी पड़ी थी

और हाथ में एक लेखनी

बस, और क्या चाहिए?

जड़ दिए कॉपी के पन्ने पे

एक-एक कर चार लाइनों की पंक्ति


"रिजल्ट क्यूँ आता है?

रोज़ डांट खिलाता है॥

अगले साल फिर पढना है

अच्छा रिजल्ट करना है"