जीवन के इस पड़ाव पर हूँ
के नहीं पता मैं क्या करूँ।
रास्ता बतलायेगा कोई, रुकूं ?
या अपना रास्ता खुद ही चुनूं?
नदी जैसे डोल रही हूँ
कभी इधर कभी उधर
पर क्या मेरी कोई दिशा निर्धारित है?
मैं जा रही हूँ किधर?
नाते रिश्ते, धर्म कर्म से परे
चाह के भी न जा सकूँगी
जो सपने पलकों में सजा रखें हैं मैंने
क्या उन्हें कभी पा सकूँगी?
प्रश्न अनेक हैं पर उत्तर नहीं है एक
तप रही हूँ, इस धूप में खुद को रही हूँ सेंक
फिर भी अपनी मंज़िल को ढूँढ न पाऊँ
इस असमंजस से बहार कैसे आऊँ?
( यह किसी एक की नहीं, हर एक प्राणी की स्तिथि है। किसी न किसी बात पे कोई न कोई यूँ असमंजस में पड़ जाता है की अपने प्रश्नों का कोई हल ही नहीं ढूँढ पाता। )