Sunday, May 11, 2014

माँ

माँ , मैं बन के तेरी परछाई जीत लूंगी इस जहां को ,
तेरे सपनें पूरे कर ज़मीं पे खींच लाऊंगी आसमां को ...

माँ, तू मेरे रग़ों में खूं बन  के बहती है ,
तेरे दूध से धोया है तूने मेरे हर गुनाह को ....

माँ  , तूने बताया था कि तुझे मैं नहीं, बेटा चाहिए था..
पर जब भी मेरी जान पे बन आयी, कैसे हराया तूने उस ' ख़ुदा ' को ?

माँ , सब कहते हैं तूने लाखों दर्द सहें हैँ..
पागल ये दुनिया कहाँ है समझनें के क़ाबिल मेरी ' माँ ' को। ।  

~ अमृता तालुकदार  ' सुबह ' …… 


HAPPY MOTHER's DAY! <3

Thursday, August 15, 2013

पशु ! इसे अपना उपहार समझो।

अब कहना नहीं सुनाना चाहती हूँ
ठंडे पड़ चुके इंसानियत को
जो सो रहा है इत्मिनान से
सफ़ेद चादर को ओढ़े।

कभी-कभी ज़रा सी चादर नीचे सरक कर
उसके मस्तक को दिखाती है
दीख पड़तीं हैं माथे की लकीरें
कितना बूढ़ा हो चुका है न?

बहरेपन का शिकार है अब वह
सुन नहीं सकता उन चीखों को
जो नाखूनों के गड़ने से
'आह' बन निकलती हैं।

सो रहा है वह इत्मिनान से
तुम सभी जानवरों के भीतर
तुम्हारे पंजों की आहट से बेख़बर
बनाकर तुम पशुओं को निडर।

मैं न्याय माँगूं तो किस से?
आसपास तो तुम ही तुम दिखाई पड़ रहे हो 
इसलिए रहने दो अपनी भीख
इस अधमरे जीवन को तुम्हारे हाथों ख़त्म नहीं करना चाहती।

जो सो रहा है तुम्हारे अन्दर
ग़र उसे जगा सको तो कह देना उसे
के मैं अब जा चुकी हूँ
और तुमने मेरी राख़ की ढेर को पानी में बहा दिया है।

पर तुम्हें साल का आखरी तोहफ़ा दिए जा रही हूँ
मेरी बेबसी, लाचारी और आंसुओं का यह पिटारा
दिल पिघले तो अपने नखों को भीतर ही रखना
शायद कहीं और काम आ जाए।

Leaving a gift for you.. my dear BEASTS!
Leaving a gift for you.. my dear BEASTS!

~~ Amrita Talukder

Thursday, December 29, 2011

असमंजस !!

जीवन के इस पड़ाव पर हूँ
के नहीं पता मैं क्या करूँ।
रास्ता बतलायेगा कोई, रुकूं ?
या अपना रास्ता खुद ही चुनूं?

नदी जैसे डोल रही हूँ
कभी इधर कभी उधर
पर क्या मेरी कोई दिशा निर्धारित है?
मैं जा रही हूँ किधर?

नाते रिश्ते, धर्म कर्म से परे
चाह के भी न जा सकूँगी
जो सपने पलकों में सजा रखें हैं मैंने
क्या उन्हें कभी पा सकूँगी?

प्रश्न अनेक हैं पर उत्तर नहीं है एक
तप रही हूँ, इस धूप में खुद को रही हूँ सेंक
फिर भी अपनी मंज़िल को ढूँढ न पाऊँ
इस असमंजस से बहार कैसे आऊँ?

( यह किसी एक की नहीं, हर एक प्राणी की स्तिथि है। किसी न किसी बात पे कोई न कोई यूँ असमंजस में पड़ जाता है की अपने प्रश्नों का कोई हल ही नहीं ढूँढ पाता। )

Friday, May 27, 2011

मेरी पहली कविता |
















कुछ अजीब थी

मेरी पहली कविता


परीकथाओं में ही सिमटा था तब

मेरे लिए यह धरती का अस्तित्व

मनीषियों के प्रवचनों का ज्ञान तो दूर

अपने ही विचारों का ठिकाना न था


बालू के ढेर पर बैठ के मंदिर बना रही थी

माँ ने जोर से आवाज़ दी

और बोलीं

"अँधेरे का ख्याल नहीं है तुमको?

कल तुम्हारे नतीजे निकलेंगे दूसरी कक्षा के

अब नयी कक्षा में जाओगी तुम!

तय्यारी नहीं करनी?"

यह कह के माँ मुस्कुरा उठी

और चूम लिया मेरे ललाट को


मैंने भी सारे पुराने किताब समेट लिए

और लगी कल का इंतज़ार करने

हाथ के पास एक कॉपी पड़ी थी

और हाथ में एक लेखनी

बस, और क्या चाहिए?

जड़ दिए कॉपी के पन्ने पे

एक-एक कर चार लाइनों की पंक्ति


"रिजल्ट क्यूँ आता है?

रोज़ डांट खिलाता है॥

अगले साल फिर पढना है

अच्छा रिजल्ट करना है"