अब कहना नहीं सुनाना चाहती हूँ
ठंडे पड़ चुके इंसानियत को
जो सो रहा है इत्मिनान से
सफ़ेद चादर को ओढ़े।
कभी-कभी ज़रा सी चादर नीचे सरक कर
उसके मस्तक को दिखाती है
दीख पड़तीं हैं माथे की लकीरें
कितना बूढ़ा हो चुका है न?
बहरेपन का शिकार है अब वह
सुन नहीं सकता उन चीखों को
जो नाखूनों के गड़ने से
'आह' बन निकलती हैं।
सो रहा है वह इत्मिनान से
तुम सभी जानवरों के भीतर
तुम्हारे पंजों की आहट से बेख़बर
बनाकर तुम पशुओं को निडर।
मैं न्याय माँगूं तो किस से?
आसपास तो तुम ही तुम दिखाई पड़ रहे हो
इसलिए रहने दो अपनी भीख
इस अधमरे जीवन को तुम्हारे हाथों ख़त्म नहीं करना चाहती।
जो सो रहा है तुम्हारे अन्दर
ग़र उसे जगा सको तो कह देना उसे
के मैं अब जा चुकी हूँ
और तुमने मेरी राख़ की ढेर को पानी में बहा दिया है।
पर तुम्हें साल का आखरी तोहफ़ा दिए जा रही हूँ
मेरी बेबसी, लाचारी और आंसुओं का यह पिटारा
दिल पिघले तो अपने नखों को भीतर ही रखना
शायद कहीं और काम आ जाए।

Leaving a gift for you.. my dear BEASTS!
~~ Amrita Talukder
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